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Showing posts from October, 2020

इक याद

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 तुम्हारी याद की सिलवटों में सब कुछ दब चुका है.सहेजने लायक तो यूं भी क्या था मेरे पास.बस एक खोज थी कि कहीं से तुम अगर आते तो शायद मुझे न पाते.प्रेम प्रतिशोध बन ललकारने लगता है और प्रतिस्पर्धा के इस युग में दिल लगाने की प्रतिस्पर्धा से मै बुरी तरह निष्काषित किया जाता हूँ किन्तु एक संतोष बना रहता है कि प्रेम में न पड़ सका तो भी इसके सम्मोहन से अछूता न रहा.

उन दिनों की बात

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 यूं भी मैं सुमेर के लिखे को पसंद करता हूँ लेकिन आज ट्विटर खंगालते वक्त मुझे उसके ब्लॉग का लिंक मिल गया.मन ने चाहा कि इसे पूरा पढ़ना चाहिए.एक ब्लॉग मैं पढ़ चुका हूँ.इच्छा थी कि एक अपनी टिप्पणी वहां छोड़ सकूं ताकि सुमेर को अपनी उपस्थिति बता सकूं लेकिन तकनीक ने सारा मूड तोबा तोबा कर दिया.             दूसरा ब्लॉग मैं पढ़ने जा रहा था हालांकि ये ब्लॉग मैं इससे पहले सुमेर के फेसबुक पेज पर पढ़ चुका हूँ लेकिन दिल किया कि इसे पढ़ना चाहिए.न जाने क्यों सुमेर का लिखा मुझे ऐसा लगता जैसे आप चारों ओर पानी से घिरे टापू पर धोबे भर रेत लिए हुए खडे है.सुमेर को पढ़ता हूँ तो सोचता हूँ रेत अंजुरी से झरने लगी है और मैं उसे टटोलने का यत्न भर कर रहा हूँ किन्तु कुछ रेत वही रह गयी है.          नागरिकता कानून के विरोध में हुए प्रोटेस्ट के दिनों की बात है ये सुमेर जश्ने रेख्ता में थे उस दिन.जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में पढ़ रहे बच्चों को बेतरतीब लाठियों से मारना शुरू कर दिया.उन पर टुकड़े टुकड़े गैंग  के मार्फ़त आतंकवादी या उसके समकक्ष हो...

श्री साब की स्मृतियां....…

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 शीघ्रता पसंद श्री साब ने चले जाने में भी शीघ्रता ही दिखाई  गहरी मौन आवाजों से मेरा राबता न था न है लेकिन एक आवाज अब भी सिहरन पैदा करती है ऐसा लगने लगता है जैसे अगले ही क्षण मैं मिट्टी के ढेले की भांत भरभरा कर चूर हो जाऊंगा । वो आवाज है - क्या बात करते है भाईसाहब..? या फिर बकवास मत कर मुझे पता है तू क्या है...? ये स्नेह मुझे विरासत में मिला है । इसकी विरासत की विराटता भी बड़ी अद्भुत है ।जी मचल जाए तो आप साब के पास जाकर बैठ जाइए वहां आपको वो सब कुछ मिलेगा जो जीवन जीने को कारगर हो । मुझे ठीक से याद है कि अखे सिंह जी साब का प्रेम अतुलनीय था । वे मजदूरों से लेकर अनजान बच्चों तक के लिए उपलब्ध थे । श्री साब का चले जाना एक सरंक्षक का चले जाना भर नही है । एक युगांत नायक का चले जाना है जिसने अपने कर्म - कौशल और जीवन पद्धति से सैकड़ों-करोड़ो लोगों के दिल जीतने का हुनर दिखाया है । प्रिय किशन के साथ साहब                उनतीस अगस्त को भी हमने उस स्नेही- आँचल की सौरभ को महसूस किया था ।देर रात तक चली यह गोष्ठी कौन जानता था अंतिम होगी ।हमने ठहाके लगाए थे,ढ...

बातें बेवजह

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 प्रेम हर शै में माकूल रहता है  बशर्ते कि प्रेम प्रेम बना रहे वह बन न जाये कभी देह का व्यापार । दुबली-पतली सी एक लड़की रास्ते निहारते वक्त  सोचती है कि प्रेम के पगमांडने कैसे होंगे । इन सबके बीच प्रेम समा जाता है भीतर बेढब बातों के बीच फंसा । ***** आकाश से ज्यों ही गिरने लगती है बूंदे एक लड़की आ जाती है घर के आंगन में अपनी बांहे फैला  निमंत्रण देती है बादलों को । बादल हथेलियों से हो कर आंखे बंद किये मुंह पर छोड़ देते है चुंबन अगले ही क्षण  बह उठता है  तरल प्रेम। ****** मैं सारी रात भर करता रहता हूँ चौकसी कहीं अदृश्य प्रेम के अनाम ख्वाब भीतर न आ जाये । ***** रेत के बिछावन पर ख्वाबों के बीचोबीच मैं करता हूँ तुमसे बात हाथ मे रेत भरता हूँ छोड़ देता हूँ तत्काल जैसे प्रेम त्याग देता है परिसीमा । ***** बेवजह की लड़ाइयों से दूर एक आदमी खेत जाता है बीच रास्ते मे प्रेम बेरिकेड लगा खड़ा रहता है । सोचता हूँ ये बेरिकेड क्या सचमुच बेरिकेड ही है या बन आयी है कोई नई आफत शायद मुहब्बत के राग पर जारी हो गया हो कोई फतवा । ***** मैं सोचता हूँ  गड़सीसर के उस पार बैठेंगे हम अलबत्ता...

हसीन शामों के दरमियां

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 तल्ख  शामों की नमी में डूबा मैं सोचता हूँ कि तुम थोड़े से मेरे हिस्से आये हो।गले ही पल थोड़ा रुक कर दुबारा सोचता हूँ।रास्ते मे जो विपरीत दिशा के मुसाफ़िर है उनसे मिलने से हमारे बस नहीं टूटते है और दुख लालराज कर रहे है। । है। हैं। कर रहे हैं। रहा है। गिर पड़ते है धड़ाम से।              एक रोज़ मायूसी की माचिस से कोई तीली सुलगा कर मैं सारी शब्दावली जला दूंगा.मैं ऐसा कभी न करूँगा लेकिन हां ऐसी चाहना हर दम बनी रहती है।एक सवाल उपजता है क्या प्रेम यही है चाहकर भी कुछ न कर पाना। प्रेम की पूर्ण व्याख्या हो या न हो किंतु एक भावना भर तो हो ही सकती है। फोन की स्क्रीन स्क्रोल करते हुए एक नाम पर आँख ठहर जाती है। मैँ बिना छेड़े आगे बढ़ जाती हूँ किन्तु एक बैचेनी मुझे घेरे रखती है। बाउपर आकाश की तलक मुँह उठाने के कुछ देर बाद जमीन को निहारते बखत मैं अपना नाम पर क्लिक कर के हाथ लगा देती हूँ। से पुचकार देता हूँ। मानो प्रेम पहुंच जाए।प्रेम केवल प्रेम हो सकता है इसका कोई दूसरा विकल्प प्रकृति ने न ढूंढा है।

छितरन

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 मैं जरा सा सोचता हूँ तो भीतर से छितर जाता हूँ.एक याद से घिरने लगता हूँ.एक याद कई-कई कोस तक साथ बनी रहती है.चलते-चलते सोचता हूँ ये दुनिया गजब है कभी छितर जाए तो क्या होगा ? क्या आदमी तब भी होगा ? अगर होगा भी तो क्या खुद को बचाने की जुगत में ही खपा रहेगा या फिर कुछ और.खैर होने को कुछ भी हो सकता है.        आसमान खाली लगने लगता है.वहां कुछ भी नही है सिवाय मौन के.मैं सुबह उठते ही खेत चला जाता हूँ.सोचता हूँ खेत जीवन से अलग कुछ यदि होता तो क्या होता.रास्ते में लोगों का जमघट है अधिकतर जाने-पहचाने चेहरे है.उन्ही के भीतर उतर न पाया हूँ. एक सिगरेट की मादक गंध तेजी से भीतर चली जाती है दिल बस उफ़फ़ कहता है और दो लंबी सांसे निर्विकार छोड़ देता है.जिसके साथ दुःख दरीचों से होते हुए आदमी तक पहुंच जाते है.जिसकी खनक, खनक नहीं पाती. न जाने क्यों प्रेम सत्य प्रतीत नहीं होता लगता है जैसे कोई छल रहा है मुझे.किसी से बात करने की इच्छा होती है तो सिगरेट को मुंह से लगा देता हूँ.मुंह भी बंद हो जाता है और स्मृतियो के साथ चाहनाएँ सुलग जाती है. किसी दरवाजे पर खड़े होकर किसी बाइक सवार को निहारते ...