छितरन

 मैं जरा सा सोचता हूँ तो भीतर से छितर जाता हूँ.एक याद से घिरने लगता हूँ.एक याद कई-कई कोस तक साथ बनी रहती है.चलते-चलते सोचता हूँ ये दुनिया गजब है कभी छितर जाए तो क्या होगा ? क्या आदमी तब भी होगा ? अगर होगा भी तो क्या खुद को बचाने की जुगत में ही खपा रहेगा या फिर कुछ और.खैर होने को कुछ भी हो सकता है.



       आसमान खाली लगने लगता है.वहां कुछ भी नही है सिवाय मौन के.मैं सुबह उठते ही खेत चला जाता हूँ.सोचता हूँ खेत जीवन से अलग कुछ यदि होता तो क्या होता.रास्ते में लोगों का जमघट है अधिकतर जाने-पहचाने चेहरे है.उन्ही के भीतर उतर न पाया हूँ.



एक सिगरेट की मादक गंध तेजी से भीतर चली जाती है दिल बस उफ़फ़ कहता है और दो लंबी सांसे निर्विकार छोड़ देता है.जिसके साथ दुःख दरीचों से होते हुए आदमी तक पहुंच जाते है.जिसकी खनक, खनक नहीं पाती. न जाने क्यों प्रेम सत्य प्रतीत नहीं होता लगता है जैसे कोई छल रहा है मुझे.किसी से बात करने की इच्छा होती है तो सिगरेट को मुंह से लगा देता हूँ.मुंह भी बंद हो जाता है और स्मृतियो के साथ चाहनाएँ सुलग जाती है.



किसी दरवाजे पर खड़े होकर किसी बाइक सवार को निहारते बखत लोग भला क्या सोचते होंगे. कमसकम यही की जीवन कभी भी पासा पलट सकता है.प्रेम जैसा यहां कुछ भी नही है किन्तु हां एक सम्मोहन जरूर उग आया है.अज्ञानता के वशीभूत हो भीतर उतरता ये सम्मोहन अचानक किसी झटके से औंधे मुंह गिर पड़ता है.लहूलुहान प्रेम झरने लगता है.जिसके साथ अनायास बहने लगता है क्रोध  व स्नेह का सम्मिश्रण...!!

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