इक याद

 तुम्हारी याद की सिलवटों में सब कुछ दब चुका है.सहेजने लायक तो यूं भी क्या था मेरे पास.बस एक खोज थी कि कहीं से तुम अगर आते तो शायद मुझे न पाते.प्रेम प्रतिशोध बन ललकारने लगता है और प्रतिस्पर्धा के इस युग में दिल लगाने की प्रतिस्पर्धा से मै बुरी तरह निष्काषित किया जाता हूँ किन्तु एक संतोष बना रहता है कि प्रेम में न पड़ सका तो भी इसके सम्मोहन से अछूता न रहा.


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