सुगन चिड़ी
किसी सुगनचिड़ी के गहरे नाद को सुने बरसों हो गए । एक लंबा अंतराल बिना रेत को गले लगाए ज्यों का त्यों बीत गया ।मुझसे आहट न हुई । यादें रह रहकर जेहन को कचोटती है और मन मसोसकर रह जाता हूँ । आंखे मूँदता हूँ तो आखातीज का खीच और फुलके पसर जाते है । जी करता है ,लौट चलूं ,दूर, बहुत दूर ।फिर सोचने लगता हूँ कि सपने सिर्फ सपने होते है वे हकीकत नहीं होते । नींद से भरी अलसाई आंखों से दुनिया देखने का प्रयास करता हूँ किन्तु दुनिया दिन ब दिन बढ़ती ही जाती है ।साफे के सलवटों में बचा कर रखी गई इज्जत वही है किन्तु अब साफे की रौनक न रही । ढेर से स्नेह से भरे शहरी उलाहने और अमल के खोबे मुझे दूसरी दुनिया लगते है । चैनजी कि दुकान मानो इस सृष्टि में नही हो। वो बहुत दूर तक पसरी हुई सी दिखती है । शाम का बखत होते ही हरजस शुरू हो जाते है । हरि के गुणगान करते हरजस । एक स्वर पनपता है, धीरे - धीरे घुल सा जाता है । मन मे आता है कि इसे हमेशा हमेशा के लिए कैद करके रख लूं । किंतु कुछ चीजें सोची जाती है,होती कभी नहीं ।सुनते सुनते ही कब लोक - परलोक हो जाता है ये बातें लिखी न जा सकती है । बल्कि वे बातें तो अनुभव की है,गह...