बातें बेवजह

 प्रेम हर शै में

माकूल रहता है 

बशर्ते कि प्रेम प्रेम बना रहे

वह बन न जाये कभी

देह का व्यापार ।


दुबली-पतली सी एक लड़की

रास्ते निहारते वक्त 

सोचती है कि

प्रेम के पगमांडने कैसे होंगे ।


इन सबके बीच

प्रेम समा जाता है भीतर

बेढब बातों के बीच फंसा ।

*****



आकाश से ज्यों ही

गिरने लगती है बूंदे

एक लड़की आ जाती है

घर के आंगन में

अपनी बांहे फैला 

निमंत्रण देती है बादलों को ।


बादल हथेलियों से हो कर

आंखे बंद किये मुंह पर

छोड़ देते है चुंबन

अगले ही क्षण 

बह उठता है 

तरल प्रेम।

******



मैं सारी रात भर

करता रहता हूँ चौकसी

कहीं अदृश्य प्रेम के

अनाम ख्वाब भीतर न आ जाये ।

*****



रेत के बिछावन पर

ख्वाबों के बीचोबीच

मैं करता हूँ तुमसे बात

हाथ मे रेत भरता हूँ

छोड़ देता हूँ तत्काल

जैसे प्रेम त्याग देता है परिसीमा ।

*****



बेवजह की लड़ाइयों से दूर

एक आदमी खेत जाता है

बीच रास्ते मे प्रेम

बेरिकेड लगा खड़ा रहता है ।


सोचता हूँ ये बेरिकेड

क्या सचमुच बेरिकेड ही है

या बन आयी है कोई नई आफत

शायद मुहब्बत के राग पर

जारी हो गया हो कोई फतवा ।

*****



मैं सोचता हूँ 

गड़सीसर के उस पार बैठेंगे हम

अलबत्ता निहारते रहेंगे तालाब

पत्थरों के शोरगुल से ही सही

शायद सजीव हो उठे प्रेम ।

*****



सोनार दुर्ग की प्राचीर पर

खडा होकर निहारता हूँ तुम्हारी सूरत

जैसे चांद के गाल पर 

उग आए कोई धब्बा ।


बेतरतीब ख्वाबो से उलझ

जैसलमेर को देखना

मुहब्बत को गगनचुंबी बना देना है

अगले ही क्षण 

हाथ छूटने लगते है

रिसने लगता है प्रेम 

छितर जाता है प्रेम ।

*****


महबूबा ने हमेशा ज्यादती की

वह घूमती रही मन दर मन

निहारती रही हर्फ दर हर्फ

लेकिन अफसोस !!

वे जान न सकी 

प्रेम पूर्ण नही होता

बस अनाम और अपूर्ण रहता है ।

*****



तेज हवा का झोंका

चीर डालता है सम्मोहन

मेरे हाथ की गर्माहट

हो उठती है अचानक तप्त 

मानो किसी गगनभट्टी से

निकाल लाये है लावा हम ।

*****



काश ! 

समझ सकती तुम 

तूफान से कितनी अधिक

नुकसानदेह होती है 

तुम्हारी नाम की आखिरी सांस ।


अफसोस !

तुमको बता न सका कि

तुम्हारे नाम के पहले हर्फ में

कितनी अमोघ शक्तियां 

यंत्रवत बैठी रहती है ।

*****



विदा होते वक्त

आंख से आंसू न गिराउंगा

बस साध लूंगा चुप्पी

सहलाता रहूंगा तुम्हारे बाल


हे ! ईश्वर

ये सच है कि

ये झूठ है....!

*****



हमेशा सताता रहा डर

दिल के दरीचों में सुराख नही होते

काश ! कि मैं बता सकता तुम्हे

दिल मे कोई खिड़की ही नही होती

ये एक स्याह सुरंग है

खुली-खुली सी

तुम्हारे नाम के अहसास से भरी-भरी।

*****



तुम्हारी याद ऐसी टँगी रहती है

जैसे खेत मे बोरडी पर टँगे रहते है

पानी की बोतल और टिफिन 

काश! कि तुम समझते 

प्रेम में होकर प्रेम समझना 

कितना कठिन काम है ।

*****



तुम्हारे पदचिन्हों की धूल

निश्चय ही रखी जायेगी

किसी न किसी पूजाघर में

आखिर लौटते हुए प्रेम की छवि

निहारना भी प्रेम ही तो है ।

*****



घुटनो के बल झुका हुआ सा मैं

मुंह को तुम्हारे पदचिन्हों के ठीक ऊपर टिकाए

बनाने लगता हूँ तुम्हारी छवि

आंसू टपकते है

भीगने लगती है तुम्हारी तर्जनी उंगली ।

*****



तुम्हारे होठो के ठीक पास

उग आया है एक तिल

निहारते हुए सोचता हूँ

प्रेम तिल भर ही तो है 

नाम-अनाम सांसे भारी हो जाती है

अचानक निश्चेत हो गिर पड़ता हूँ

ठीक तुम्हारे बगल मे ।

******



मेरे कान में फुसफुसाते हुए 

मेरा नाम

 झूठ ही सही

तुम कितनी सुंदर लगती हो ।

*****




मैं खड़ा रहा एक पहर

तुमसे बात करते हुए

शायद खड़े हों जाना

बैठे जाने से अधिक प्रेममय हो

किन्तु हां एक इंतजार 

अब भी थामे हुए है मेरा हाथ ।

*****



माशूका नही जानती

महबूब झांकता है सितारा 

और करता रहता है बात

तुम्हारे साथ और अकेला भी ।


वह जानता है कि

बतियाना बुरा हो सकता है 

निहारना कतई नही। 

किन्तु महबूबा के हाथ धरते ही

सितारे टिमटिमाने लगेंगे ।

*****



क्या ये मुमकिन है कि

बारिशों से भीगे खत

बांचते बखत मैं चिल्लाता रहता तुम्हारा नाम

शायद नही ।




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