हसीन शामों के दरमियां

 तल्ख  शामों की नमी में डूबा मैं सोचता हूँ कि तुम थोड़े से मेरे हिस्से आये हो।गले ही पल थोड़ा रुक कर दुबारा सोचता हूँ।रास्ते मे जो विपरीत दिशा के मुसाफ़िर है उनसे मिलने से हमारे बस नहीं टूटते है और दुख लालराज कर रहे है। । है। हैं। कर रहे हैं। रहा है। गिर पड़ते है धड़ाम से।

   



         एक रोज़ मायूसी की माचिस से कोई तीली सुलगा कर मैं सारी शब्दावली जला दूंगा.मैं ऐसा कभी न करूँगा लेकिन हां ऐसी चाहना हर दम बनी रहती है।एक सवाल उपजता है क्या प्रेम यही है चाहकर भी कुछ न कर पाना। प्रेम की पूर्ण व्याख्या हो या न हो किंतु एक भावना भर तो हो ही सकती है।




फोन की स्क्रीन स्क्रोल करते हुए एक नाम पर आँख ठहर जाती है। मैँ बिना छेड़े आगे बढ़ जाती हूँ किन्तु एक बैचेनी मुझे घेरे रखती है। बाउपर आकाश की तलक मुँह उठाने के कुछ देर बाद जमीन को निहारते बखत मैं अपना नाम पर क्लिक कर के हाथ लगा देती हूँ। से पुचकार देता हूँ। मानो प्रेम पहुंच जाए।प्रेम केवल प्रेम हो सकता है इसका कोई दूसरा विकल्प प्रकृति ने न ढूंढा है।




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