मधु मेम नहीं रही !!
बरसो की कसमकस धीरे धीरे गांठे खोल देती है.पंख लगाकर उड़ते हुए दिन अचानक ठहर जाते है.इतना धीरे ठहर पाना जैसे मन अटक गया हो कहीं.आंख चुराने का जी ही न करे.एक तस्वीर को इतनी देर तक देखा जाए जब तक खुद तस्वीर न चिल्लाए.जीवन इतना सघन हो गया है कि लोग आते और चले जाते है लेकिन मैं बतिया नहीं पाता उनसे.ऐसे कई सारे चेहरे है जिन्होंने मुझे बनाया है.हाथ पौंछकर चेहरे पर से आंसू हटाये है.गीता धाम का मेरे जीवन मे अलग ही एक महत्व है.मैं निजी रूप से कभी इतना धार्मिक न हो पाया कि किसी सच को स्वीकार सकूं लेकिन इतनी सहृदयता हमेशा बनी रही कि खुश लोंगो के साथ खुश दिख सकूं.एक गोल घेरे में घूमते घूमते मैं गिर पड़ता और कोई हाथ थामकर साथ बढ़ता.मैं फिर भी गिरता ही जाता. मेरे लिए कुछ स्थानों का विशेष महत्व है.ये बाते मुझे रवीश के "ईश्क़ में शहर होना " का बोध कराती है. हमेशा मन मे ये बचा रहता है कि जितना मेरे जीवन पर मेरा हक है उतना ही किसी ओर का भी है.मैं खुद को किसी के प्रेम तले दबा महसूस करता हूँ.खुद को एक आदमी बना देने की जुगत...