श्री साब की स्मृतियां....…
शीघ्रता पसंद श्री साब ने चले जाने में भी शीघ्रता ही दिखाई
गहरी मौन आवाजों से मेरा राबता न था न है लेकिन एक आवाज अब भी सिहरन पैदा करती है ऐसा लगने लगता है जैसे अगले ही क्षण मैं मिट्टी के ढेले की भांत भरभरा कर चूर हो जाऊंगा । वो आवाज है - क्या बात करते है भाईसाहब..? या फिर बकवास मत कर मुझे पता है तू क्या है...? ये स्नेह मुझे विरासत में मिला है । इसकी विरासत की विराटता भी बड़ी अद्भुत है ।जी मचल जाए तो आप साब के पास जाकर बैठ जाइए वहां आपको वो सब कुछ मिलेगा जो जीवन जीने को कारगर हो । मुझे ठीक से याद है कि अखे सिंह जी साब का प्रेम अतुलनीय था । वे मजदूरों से लेकर अनजान बच्चों तक के लिए उपलब्ध थे । श्री साब का चले जाना एक सरंक्षक का चले जाना भर नही है । एक युगांत नायक का चले जाना है जिसने अपने कर्म - कौशल और जीवन पद्धति से सैकड़ों-करोड़ो लोगों के दिल जीतने का हुनर दिखाया है ।
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| प्रिय किशन के साथ साहब |
उनतीस अगस्त को भी हमने उस स्नेही- आँचल की सौरभ को महसूस किया था ।देर रात तक चली यह गोष्ठी कौन जानता था अंतिम होगी ।हमने ठहाके लगाए थे,ढेर सा आशीष पाया था,आस्वासन पाया था,प्रेम पाया था और सुदूर भविष्य के कंटीले पथ की थपकियां पाई थी ।करील कुंज के भीतर सघन अंधेरा पसर जाना भला किसे विचलित न करेगा । इन सबके बाद यदि कुछ बचता है तो नीरव और शांत उफ़ उफ़ और बस उफ़ । जीवन को इतनी शांति से जीने वाले मेरी दृष्टि में वे पहले आदमी थे ।उनका स्नेह वटवृक्ष की भांति विशाल था जिसकी ठंडी छाया में कोई भी जाना -अनजाना निःसंकोच बैठ सकता है ।आज आसमां को देखता हूँ तो दुख लरज पड़ते है स्नेह झरने लगता है ।हमारी नियमित दिनचर्या का सांयकाल सूना हो जाता है ।गाय की सेवा को धर्म से जोड़ने वाले साब धर्म के मूर्तिमान स्वरूप थे ।मुझे जव्वाद शैख़ की गजल का मतला याद आता है कि -:
"कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है ।
फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है ।।"
पूर्व संध्या पर अर्धरात्रि तक चले मिलन के बाद अगली सुबह मुझे एक चिल्लाहट ने दी ।यह आवाज किशन की थी ।मेरे अतिशय प्रिय साथी की ।जिसे अपने जन्म से अब तक जानता था । आवाज में डर और दुख का सामंजस्य था ।जिसे अनुभूत किया जाना लगभग असह्य था ।मैं दौड़कर श्री साब के चरणों मे बैठ गया ।गाय को धर्म समझने वाले श्री साब के लिए हम सबसे दूर चले जाने का इससे सुंदर समय भला क्या हो सकता था ।इन हालातों से पहले वे गाय को चारा खिला चुके थे और ग्वालों को भलामण भी दे चुके थे ।लेकिन कुछ समझ पाते उससे पहले सदियों का सफरनामा समेट यायावर महज तीस मिनट में दीर्घ कालीन यायावरी पर निकल गया ।मुझे एक चीज हमेशा केंद्रित करती है और वह है दुख ।मैं टूट सकने के पश्चात इतना संबल नही जुटा सकता कि संभल सकूं ।
मुझे नही पता कि ईश्वर का कितना विस्तार है या फिर ईश्वर की क्या सीमाएं है किंतु हां इतना अवश्य कह सकता हूँ ईश्वर के दिल मे प्रेम नही हो सकता । वह प्रेम की कमी का अनुभव ही तो कर रहा था जिसकी पूर्ति के लिए उसने श्री साब को अपने पास बुला लिया ।
---- कमल सिंह सुल्ताना
9929767689




Always miss you saab
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