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जून सात की सुबह

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 जून सात की सुबह उसके जाने की सुबह से ठीक पहले की सुबह थी. मुझे जाने के प्रति सदैव बेरुखी ही रही.उसका यह कह देना की कल मैं चली जाऊंगी फिर बात न होगी. ये कितना करुण प्रहार था भला कोई दूजा क्योंकर समझेगा.इस जाने में केदारनाथ सिंह का जाना शामिल था. जिसमे लौटने की आहट न थी. अभी पिछली सत्ताईस तारीख की ही तो बात थी कि हम बात कर पाए थे.बरसो की सघन चुप्पी तोड़ पाए थे. अचानक सब कुछ इतना जल्दी कैसे हो जाता है.महज दस दिन अंतराल नहीं होता. समय व्याधि बन जाता है.असहय व्याधि. कोमल चक्षुओं में जल भर देने के इस उपक्रम से मैं भला कब तक विलग रहूंगा ? कब तक मैं हृदय के आलंगन में डूबा रहूंगा.जाने वाला अगर सचमुच जा चुका होता तो क्या शेष रह जाता ? निरी चुप्पियों के अतिरिक्त मैं बचा ही क्या पाया प्रेम में ?                         अनुनय की आकांक्षा मुझ में घर कर गई थी. जी चाहता उसका जाना मेरा लौटना बन जाये.जितनी दुविधा पुल के इस पार थी उससे दुगुनी दुविधा की नाव में वह भी फंसी थी.मन थिर रह जाता.मुख से बोल न फटते. जैसे ही उसने कहा मैं चली जाऊंगी.मु...

हम प्रेम को कहां समझ पाते है

 प्रतिभा से होकर गुजरता हूँ एक तस्वीर आंखों में ठहर जाती है । मन अगर झरने लगे तो मारीना की तस्वीर बना देता है । प्रतिभा की इस पुस्तक को हालांकि मैं पढ़ नही पाया हूँ लेकिन फिर भी मुझे लगता है की इसे मैंने अनुभूत किया है । मारीना के विषय मे बताते समय प्रतिभा संवेदित दिखती है । उनका प्रेम छलक पड़ता है ।कभी -कभी तो प्रतिभा और मारीना एकमेक हो जाती है ।  ओ मेरे प्यारे देश रूस  मत शर्मिंदा हो  हमारे नंगे पैर देखकर  परियां हमेशा नंगे पैर ही होती हैं  बूट पहनकर तो राक्षस आते हैं  जो भी नंगे पैर नहीं है  वह असहनीय है.  उस समय की यह कविता जब रूस अपने सबसे विकट समय से गुजर रहा था । मारीना भी खुद को इससे विलग नहीं रख पाती ।मारीना कविताएँ जीते हुए लिखती है वे चाहती है कि कविता का हर एक शब्द स्वेद से सींचकर लिखा जा सके । गहरी आत्मानुभूति व भयावह मनःस्थिति के बीच का ये दौर रहा होगा जब मारीना ये कविता लिख रही होंगी । ये कविता मारीना की जिजीविषा व संघर्ष दर्शाती है । मारीना विचलित नहीं दिखती।किसी भी छोर से देखकर मारीना के देश प्रेम पर सवाल नहीं उठाए जा सकते । मा...

मधु मेम नहीं रही !!

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  बरसो की कसमकस धीरे धीरे गांठे खोल देती है.पंख लगाकर उड़ते हुए दिन अचानक ठहर जाते है.इतना धीरे ठहर पाना जैसे मन अटक गया हो कहीं.आंख चुराने का जी ही न करे.एक तस्वीर को इतनी देर तक देखा जाए जब तक खुद तस्वीर न चिल्लाए.जीवन इतना सघन हो गया है कि लोग आते और चले जाते है लेकिन मैं बतिया नहीं पाता उनसे.ऐसे कई सारे चेहरे है जिन्होंने मुझे बनाया है.हाथ पौंछकर चेहरे पर से आंसू हटाये है.गीता धाम का मेरे जीवन मे अलग ही एक महत्व है.मैं निजी रूप से कभी इतना धार्मिक न हो पाया कि किसी सच को स्वीकार सकूं लेकिन इतनी सहृदयता हमेशा बनी रही कि खुश लोंगो के साथ खुश दिख सकूं.एक गोल घेरे में घूमते घूमते मैं गिर पड़ता और कोई हाथ थामकर साथ बढ़ता.मैं फिर भी गिरता ही जाता.                        मेरे लिए कुछ स्थानों का विशेष महत्व है.ये बाते मुझे रवीश के "ईश्क़ में शहर होना " का बोध कराती है. हमेशा मन मे ये बचा रहता है कि जितना मेरे जीवन पर मेरा हक है उतना ही किसी ओर का भी है.मैं खुद को किसी के प्रेम तले दबा महसूस करता हूँ.खुद को एक आदमी बना देने की जुगत...

उसने गांधी को क्यों मारा ?

 वैचारिक उथल पुथल और जिज्ञासा की ख़ुराक़ है -"उसने गांधी को क्यों मारा?" गांधी अपने समय से हमारे समय तक के सबसे चर्चित नाम है. गांधी इसीलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि महात्मा गांधी के अतिरिक्त एक पक्ष वकालत की डिग्री लिए हुए वकील मोहनदास करमचंद गांधी भी का है. जो व्यक्ति के हृदय परिवर्तन में विश्वास करते है.कट्टरपंथी समुदायों के लिए गांधी और गांधी के जैसे लोग राह के रोड़े है इस बात में कोई दोराय नहीं है. ध्यान रहे कट्टरपंथी का तात्पर्य सिर्फ एक समुदाय से नहीं अपितु दोनों अथवा सभी कट्टरपंथीयो के मूल में निहित भावना से है. आम जीवन मे गांधी के आलोचक लगभग वही लोग है जिन्होंने गांधी के जीवन के 'कवर पृष्ठ' को देखा तक नहीं है. रटे रटाये तर्कों और अंधभक्ति के सीने पर बैठकर गोली चलाते ये लोग लगभग अनभिज्ञ है. गांधी को गाली देना देश को गाली देना है और खुद की आत्मा के साथ खिलवाड़ तो है ही. गांधी जी का वैचारिक प्रभाव इस कदर तक था कि लोग गांधी से मिलने के बाद आदतें बदल डालते और आदतें उनका जीवन. लोगों ने सीमित समय गुजारकर गांधी के जीवन और व्यवहार पर पुस्तकें लिख दी और यह गांधी का ही प्रभा...

उफ़ प्रेम को समझ पाना कितना मुश्किल है

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 उफ़ प्रेम कितना मुश्किल होता है किसी का होना भुला पाना सच में बेहद मुश्किल भरा काम है. खास कर तब जब श्वांस की फांस फंसी हो. आम जीवन मे कई लोगों को सुनते पढ़ते है लेकिन कुछ की गहरी ख़ुमारी भर आती है जीवन में. उन का खुमार ऐसा होता है कि हम उनको गुनगुना रहे होते है लेकिन एक धक्के के बाद ये हमें पता चलता है.मुझे नहीं मालूम ख़ुमारी और सम्मोहन में कितना अंतर है लेकिन एकमेक जरूर होते होंगे कहीं और मैं सोचता हूँ मैं उसी संगम पर हूँ.                किसी रोज दप्पू खान को सुना औऱ वो जस का तस बैठ गया ज़ेहन में. मैं मूमल के विषय मे कुछ सोचूं तो दप्पू खान की स्मृति अनायास आ ठहरे. खाकी कोट पहने बीड़ी पीता हुआ, नाक नुक्स से चितेरा. बस की आखिरी सीट पर बैठा सा. मैं पहली दफा पहचान ही न पाया. पहचानूँ भी भला क्यों. इतना बड़ा गायक यूं बस में भला क्या करेगा ? मेरा ही मन उजड़ा है. न जाने क्यों लगा शायद यही हो. मान जी से पूछा तो कन्फर्म हुआ. इतने में दप्पू खान बीड़ी जला चुका था. मुझे हमेशा ही लगता है कि कुछ लोग बीड़ी पीते हुए अचानक से सुंदर हो जाते है ये उनके प्रति सम्मोहन है...

लुद्रवा : सांस्कृतिक विरासत

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 यात्राओं के संजोग बिना सोचे अगर बनते है तो वे खूबसूरत हो जाते है. किसी रोज मैं मूमल पर लिखा दीनदयाल जी ओझा को सुना रहा था तो उन्होंने बीच मे रोकते हुए मुझे कहा कि कभी लुद्रवा गए हो? देखी है काक नदी ? मूमल के अवशेष देखे है ? मेरे पास सिवाय ना में गर्दन हिलाने के, कुछ भी नहीं था. मन मे एक इच्छा हुई कि जाना ही चाहिए. लुद्रवा मूमल-महेंद्रा के प्रेम आख्यानों से भरा प्रदेश है.शुष्क रेगिस्तान में काक नदी के अवशेष इसे जीवंतता प्रदान करते है. इसके अलावा यहां की सौंदर्यता में चार चांद लगाते है जैन मंदिर.यहां के प्राचीन घर व इमारतें तो है ही सम्मोहनीय.शांत चित्त से कहा जाए तो लुद्रवा प्रेम की धरती है. लोद्रवा का इतिहास कहता है कि यहां लोधी(परमार) राजपूतों का शासन था. किसी जमाने मे यहां के शासक थे नृपभानु और चौदह किलोमीटर दूर जैसलमेर के शासक थे देवराज. लुद्रवा के राजपुरोहित की किसी बात को लेकर नृपभानु से असमहति हो गई और वे जैसलमेर चले गए. वहां जाकर आत्मग्लानि में जलते पुरोहित ने लुद्रवा को समाप्त करने के षड़यंत्र रचे.उसने देवराज को नृपभानु की कन्या से विवाह हेतु उकसाया.नृपभानु यह सन्देश पाकर प...

किसान आंदोलन - दलवीर के हवाले से

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 अचानक से नीली पगड़ी का सरदार मेरे पास आकर कहता है सत श्री अकाल. मैं चोंकपड़ता हूँ.पंजाब के विषय वैविध्य वाले इलाके से एक सरदार भला यहां कैसे आ पहुंचा.मैं कुछ दिनों से किसान आंदोलन की रिपोर्ट पढ़ रहा हूँ और कोशिश रहती है कि अपडेट रह सकूं.खासकर उस दौर में जब मीडिया अपना अस्तित्व खोती जा रही है. सामान्य बातचीत शुरू होती है.वह अपना नाम दलवीर सिंह बताता है.साथ आये शख्स का नाम बलजेन्दर सिंह बताता है.मैं दलवीर से बात करता हूँ तो वह बताता है कि वह अपने परिवार का इकलौता चिराग है.पिताजी खेत संभालते है और दलवीर ट्रक चलाते है.दो बच्चे है दलवीर के.बच्चा सातवीं में पढ़ता है और बच्ची अभी चौथी में है.पिताजी खेतों की तरफ जाते रहते है.हालांकि वे खुद काश्त नहीं करते है.बस ध्यान रखते है. मैंने कृषि आंदोलन के बारे में जानना चाहा. मैंने उससे पूछा "आप खालिस्तानी हो ?" उसने कुछ देर मुझे देखा और फिर कहा तुम राजपूत हो ना. मैंने हामी भरी तो उसने कहा जिस तरह से तुम राजपूत हो हम सिक्ख भी है.खालिस्तानियों से हमारा भला क्या काम.मैंने उससे कहा 'खालिस्तानी भारत को तोड़ना क्यो चाहते है ?' उसने मुझसे सवाल ...