उन दिनों की बात

 यूं भी मैं सुमेर के लिखे को पसंद करता हूँ लेकिन आज ट्विटर खंगालते वक्त मुझे उसके ब्लॉग का लिंक मिल गया.मन ने चाहा कि इसे पूरा पढ़ना चाहिए.एक ब्लॉग मैं पढ़ चुका हूँ.इच्छा थी कि एक अपनी टिप्पणी वहां छोड़ सकूं ताकि सुमेर को अपनी उपस्थिति बता सकूं लेकिन तकनीक ने सारा मूड तोबा तोबा कर दिया.



            दूसरा ब्लॉग मैं पढ़ने जा रहा था हालांकि ये ब्लॉग मैं इससे पहले सुमेर के फेसबुक पेज पर पढ़ चुका हूँ लेकिन दिल किया कि इसे पढ़ना चाहिए.न जाने क्यों सुमेर का लिखा मुझे ऐसा लगता जैसे आप चारों ओर पानी से घिरे टापू पर धोबे भर रेत लिए हुए खडे है.सुमेर को पढ़ता हूँ तो सोचता हूँ रेत अंजुरी से झरने लगी है और मैं उसे टटोलने का यत्न भर कर रहा हूँ किन्तु कुछ रेत वही रह गयी है.



         नागरिकता कानून के विरोध में हुए प्रोटेस्ट के दिनों की बात है ये सुमेर जश्ने रेख्ता में थे उस दिन.जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में पढ़ रहे बच्चों को बेतरतीब लाठियों से मारना शुरू कर दिया.उन पर टुकड़े टुकड़े गैंग  के मार्फ़त आतंकवादी या उसके समकक्ष होने के आरोप थे. मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है कि मैं उन दिनों जैसलमेर के बहुत छोटे से कस्बे सुल्ताना में था और घटना को टेलीविजन पर देख रहा था.मुझे हमेशा से ही टेलीविजन मोदी प्रचारक प्रतीत होते है.इसके कारण गिनवा सकने जितना सामर्थ्य मैं नहीं रखता हूँ और वैसे भी यदि गिनवा लिए जाए तो वामपंथ का प्रमाण पत्र बिना किसी यत्न के मेरे घर सहजता से पहुंच जाएगा.




            देश की सेंट्रल यूनिवर्सिटी जिसे गृह मंत्रालय हर बार टॉप फाइव यूनिवर्सिटी ऑफ इंडिया की रैंकिंग में रखता है.वहां से पढ़कर निकले विद्यार्थी देश की प्रशासनिक,राजनैतिक व सामाजिक उन्नति में अपना योगदान करते हुए भारतवर्ष के विकास की रीढ़ को सीधा रखते है लेकिन मीडिया और सत्ता नशीं सरकारों का कहना है कि वे देश द्रोही है.न जाने क्यों मुझे कुछ भारी-भारी लगता है.ऐसा प्रतीत होता है कि अगले ही क्षण में धड़ाम से चक्कर के मारे गिर जाऊंगा.येनकेन प्रकारेण खुद को संभालते हुए सोचता हूँ दुनिया मे सबसे अचरज का विषय हम भारतीय ही है.हो भी क्यों नहीं. सरकारे और मिडिया जिस वक्तव्य को एक बार अपनी जिव्हा या स्क्रीन से दिखा दे.हमारे लिए वही ब्रह्म-वाक्य बन जाता है.





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