मधु मेम नहीं रही !!
बरसो की कसमकस धीरे धीरे गांठे खोल देती है.पंख लगाकर उड़ते हुए दिन अचानक ठहर जाते है.इतना धीरे ठहर पाना जैसे मन अटक गया हो कहीं.आंख चुराने का जी ही न करे.एक तस्वीर को इतनी देर तक देखा जाए जब तक खुद तस्वीर न चिल्लाए.जीवन इतना सघन हो गया है कि लोग आते और चले जाते है लेकिन मैं बतिया नहीं पाता उनसे.ऐसे कई सारे चेहरे है जिन्होंने मुझे बनाया है.हाथ पौंछकर चेहरे पर से आंसू हटाये है.गीता धाम का मेरे जीवन मे अलग ही एक महत्व है.मैं निजी रूप से कभी इतना धार्मिक न हो पाया कि किसी सच को स्वीकार सकूं लेकिन इतनी सहृदयता हमेशा बनी रही कि खुश लोंगो के साथ खुश दिख सकूं.एक गोल घेरे में घूमते घूमते मैं गिर पड़ता और कोई हाथ थामकर साथ बढ़ता.मैं फिर भी गिरता ही जाता.
मेरे लिए कुछ स्थानों का विशेष महत्व है.ये बाते मुझे रवीश के "ईश्क़ में शहर होना " का बोध कराती है. हमेशा मन मे ये बचा रहता है कि जितना मेरे जीवन पर मेरा हक है उतना ही किसी ओर का भी है.मैं खुद को किसी के प्रेम तले दबा महसूस करता हूँ.खुद को एक आदमी बना देने की जुगत में मैं विफल रहा हूँ सदा से ही लेकिन बावजूद इसके कुछ लोगों ने स्नेह की थपकियाँ देकर बढ़ाया मुझे.चाहे मैं भीमजी,गुलाब जी या भाभू की बात करूं या फिर मैं रवि,नपु, मंजू, प्रेम,और कान सा की बात करूं.एक आकर्षण हर वक़्त बना रहता है.मेरे ही परिवार की भांत इन लोंगो का मुझ पर हक है.मैं कभी भी भाभू के पास जाकर स्नेह से बैठ सकता था जितनी सहजता मुझे अपनी मां के पास बैठने में आती है.भीमजी की डायरी में जब चाहे दर्ज करवाकर एटीएम की तरह मैं पैसे ला सकता था.बिना ये जाने और पूछे कि कहाँ से आएंगे और कहां जाएंगे. एक स्नेही मां का प्रेम और पिता का कसैलापन मुझे सृष्टि में कभी बंटा हुआ नहीं दिखता.परदेश में ऐसे लोग मिल जाये तो देश भी बेसुरा लगने लगता है.
ज्योंहि किसी ने कहा मुझे की 'मधु मेम नहीं रही'. मैं जड़ हो गया हूँ.मेरी स्मृति थक गई है.कुछ भी याद कर पाने का साहस नहीं बचा है.ऐसा लगता है अगले ही क्षण कुछ भीषण होगा किन्तु इससे भीषण भला क्या होगा.जीवन सचमुच कितना निष्ठुर है.विधाता कितना क्रूर है.आज जब ये सच सुनता हूँ तो लगता है कुछ भी शेष नहीं,सब अशेष है.एक अध्यापिका के रूप में आई मधु मेम कब मेरी दोस्त और परिवार का हिस्सा बनी ये सोचना अब मेरे बस में कहाँ. मैं जब चाहे मधु मेम के घर जा सकता था.उनके बच्चे के साथ खेल सकता था.रसोई में जाकर खुद चाय बना सकता था.प्राची की होमवर्क में हेल्प कर सकता था लेकिन सब कुछ इतना जल्दी.रेशम की डोर से बंधी गुड़ियाएं होता है जीवन.गुड़िया उस पर झूलती झूलती आत्महंता बन जाती है.इन सबके होने में कोई अफसोस भी नहीं होता.मेरे कानों में मानो बार बार एक ही गूंज आ रही है "जाना इस संसार की सबसे भीषणतम क्रिया है". एक साल तक मुझे इस बात का अहसास तक न था कि मधु मेम नहीं है इस संसार मे.मैं ख्वाब बुनता था. मैं लौटने के ख्वाब कहता था.आज ये जान पाना की लौटना असहय नहीं अदृश्य होता है.
सब मौसमों से चुराकर खिल गए फूल झर जाना कितना दुखद है.वाकई गिरने से अधिक दुखदायी कुछ भी नहीं.जीवन का शजर बीत जाएगा और पलाश कराहता रहेगा देर तक.

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