अपना बाड़मेर

 मीनाक्षी,सूरज और मानसा की नजर में अपना बाड़मेर 

____________________________

बाड़मेर यूं भी खुश मिजाज शहर है.यहां की फिजाओं में अमन व चैन का घुलना प्रेम की निशानी है.रुमानियत आब-ओ-हवा के साथ जहां -तहां फिरती रहती है.यहां का लोक खासा प्रभावी है.लोक की चीजें समय के साथ अपना प्रभाव छोड़ती नजर आती है.ऐसे अदीठे लोक से प्रेम हो होना खुशी भर देता है. मैं एक लंबे समय तक बाड़मेर रहा और उसे जीते समय मुझे हमेशा ही एक पूर्णता का सा आभास हुआ.किसी अनजान पर्यटक अथवा मुझ जैसे यायावर का ये धरती बड़ी बेचैनी से स्वागत करती प्रतीत होती है.यहां के कई प्रवासियों से मिला भी और अनुभव जानने के भी प्रयास किये सब कुछ पॉजिटिव ही बना रहा.यहां के फोटोग्राफर यूं भी अपने काम के लिए मशहूर है लेकिन मुख्यतः मैंने मानसा कंवर राणीगांव और सूरज कंवर सोढा को ही जाना है.ये जानना ऐसा है जो आप संवेदना से जानते है.दोनों ही मेरे लिए पूर्ण अपरिचित है लेकिन बावजूद इसके जब मैं फ़ोटोज में बाड़मेर से प्रेम देखता हूँ तो एकमेक हो जाता हूँ.मुझे किसी विलगता का आभास ही नही हो पाता.कुछ दिन पूर्व तक मुझे ये दो नाम ही ज्ञात थे किंतु तीसरा नाम चौकाने वाला है क्योंकि इतनी अमेजिंग फोटोग्राफर का बैचमेट रहने के बावजूद भी मैं मिल न पाया कभी.रेत की संपति को निहारना और उसे दुनिया के सामने प्रदर्शित करते हुए जो प्रसन्नता होती है उसे जीने का काम करती है मीनाक्षी. 


       


मीनाक्षी फोटोग्राफी को जीवन मानती है.उसे लगता है कि आदमी फ़ोटो खींचता है तो उसका अंदरू बचा रहता है.मुझे यहां होरेस की गूंज आती है कि -'अ पिक्चर इज अ पोएम विद आउट वर्ड्स'. फोटो संवेदना दर्शाते हैं और मुझे प्रेम से भर देते है.मेरे किसी राह चलते उदास आदमी को देखकर उदासी से भर आने के दिन मुझे अब याद आते है.एक बेसब्री बनी रहती है कि अवसाद का प्रेम अब भी जीवित है.भारतीय लोक मेरे लिए इस लिहाज से भी रुचिकर है क्योंकि इस लोक ने मुझ जैसे अवसादी आदमी को भी जीवित रखा है.ऐसे चमत्कारिक लोक को दुनिया को दिखाना गर्व की ही तो बात है.फ़ोटो ग्राफी मुझे महीन सूत की रंगीन लड़ियों से आसमान को रंगकर देखने जैसा लगती है.मानो रंग- बिरंगा आकाश मद्धम बूंदे बरसाता रहे.इस गीलेपन से दुनिया के गीले हो जाने के ख्वाब देखता हूँ और झरने लगता हूँ.किसी की अनुपस्थिति जानकर खुद ही आंसू पोंछ लेता हूँ और काम मे सलंग्न हो जाता हूँ.बाड़मेर के किशोर जी मेरे बाड़मेर प्रेमी होने का आधार है उनकी पंक्ति मुझे अपने लिए भी याद आती की -'मैं उन लोगो मे से हूँ जो बिना मिले या पूर्णतः अनजान लोगों के लिए भी प्रसन्न रहने की प्रार्थना करते है'



             यहीं के अंकित कहते है कि -: " गांव वालों को शहर रुचते है और शहर वालों को गांव.वहीं मेरे सरीखे टाउन ब्वॉय को दोनों ही से समान नेह होता है और दोनों ही के प्रति आसक्ति।" इसी आसक्त भाव से ग्रसित हुआ मैं बाड़मेर के मुख्य बाजार को इन तीनों ही की फोटोग्राफी में महसूस करता हूँ.सदियों तक वीराने देखने वाली इमारतों से मैं प्रेम करने लगता हूँ.दिन भर मोटरों और गाड़ियों के आवाजों से भरे इस शहर में जब आरटीओ ऑफिस पर लगी इंदिरा जी की मूर्ति देखता हूँ तो आंखे चमकने लगती है.इन सबके अलावा दिन भर बेताब रहने वाली इन जगहों के साथ शांत सूर्योदय पंछियों के कलरव के साथ देखता हूँ तो मन बाग बाग हो जाता है. मीनाक्षी की फोटोग्राफी को देखता हूँ तो मुझे बाड़मेर प्रेमी होने पर खुशी मिलती है.क्रूड ऑयल के विदेशी व्यापार के इस देश को फोटोग्राफी में निहारकर यहां की सुंदरता बढ़ने लगती है.जगहों के साथ मैं फिट बैठता हूँ.मुझे फोटोग्राफी इस लिहाज से भी भली लगती है कि आपको बात पहुंचाने के लिए माध्यम की आवश्यकता नही होती.मानसा और मीनाक्षी इसे बेहद निजी मसअला मानती है तभी तो वे इसे छिपाने का प्रयत्न भी करती है.किन्तु समस्त योग्यताएं तो समाज की न्यास है.बाहर से सभ्य दिखने वाले लोग अचानक हम अमानवीय होने लगते है.हमारे रिश्ते दरकने लगते है और संबन्ध रिसने लगते है.संबंधो का ये रिसाव एक अनावश्यक मवाद तैयार करता है और अंततः खुद ही समाप्त भी हो जाता है.


               


मयूर नोबल्स एकेडमी की विद्यार्थी रही मीनाक्षी फोटोग्राफी को पेसन मानती है.इस तरह पेसनेट हो जाने से हमे अपने जीवित होने का आभास होता रहता है.चौधरी पुस्तक भंडार,अहिंसा सर्किल,लाल शब्दों में चमकते बाड़मेर रेलवे स्टेशन,गढ़ मंदिर व शिव मंदिर के पहाड़ों, महावीर पार्क और सिनेमा हॉल  की छवि के आगे दुनिया विफल प्रतीत होती है.रात की चांदनी में जगमगाते शहर,लाल लाइट्स में हुए कैंडल डिनर,बार व कैफे की तस्वीरें बाड़मेर के सम्मोहन को जिंदा रखती है.बात-बेबात भूलने की सारी चीजें याद रहती है.मीनाक्षी बेहद साधारण जीते हुए असाधारण फोटोग्राफी की शौकीन लगती है.

                ---- कमल सिंह सुल्ताना

Comments

Popular posts from this blog

उफ़ प्रेम को समझ पाना कितना मुश्किल है

जून सात की सुबह