उफ़ प्रेम को समझ पाना कितना मुश्किल है


 उफ़ प्रेम कितना मुश्किल होता है


किसी का होना भुला पाना सच में बेहद मुश्किल भरा काम है. खास कर तब जब श्वांस की फांस फंसी हो. आम जीवन मे कई लोगों को सुनते पढ़ते है लेकिन कुछ की गहरी ख़ुमारी भर आती है जीवन में. उन का खुमार ऐसा होता है कि हम उनको गुनगुना रहे होते है लेकिन एक धक्के के बाद ये हमें पता चलता है.मुझे नहीं मालूम ख़ुमारी और सम्मोहन में कितना अंतर है लेकिन एकमेक जरूर होते होंगे कहीं और मैं सोचता हूँ मैं उसी संगम पर हूँ.

  

            किसी रोज दप्पू खान को सुना औऱ वो जस का तस बैठ गया ज़ेहन में. मैं मूमल के विषय मे कुछ सोचूं तो दप्पू खान की स्मृति अनायास आ ठहरे. खाकी कोट पहने बीड़ी पीता हुआ, नाक नुक्स से चितेरा. बस की आखिरी सीट पर बैठा सा. मैं पहली दफा पहचान ही न पाया. पहचानूँ भी भला क्यों. इतना बड़ा गायक यूं बस में भला क्या करेगा ? मेरा ही मन उजड़ा है. न जाने क्यों लगा शायद यही हो. मान जी से पूछा तो कन्फर्म हुआ. इतने में दप्पू खान बीड़ी जला चुका था. मुझे हमेशा ही लगता है कि कुछ लोग बीड़ी पीते हुए अचानक से सुंदर हो जाते है ये उनके प्रति सम्मोहन है या मेरी मूर्खता, नहीं मालूम.


दीनदयाल जी ओझा से मिलने का वखत था.मैं कह बैठा मूमल का देश है तो मनोरम.कहीं भी चले जाओ लेकिन ये देश नहीं निकलता ज़ेहन से. ओझा जी ने बस यही कहा लुद्रवा चले जाओ या फिर दप्पू खान के पास.उनका किरदार बड़ा व्यापक था फलक पर.जिस ओर बह जाते सब कुछ अपना कर लेते.संगीत उनकी धमनियों में था. दादाजी से कामायचा लिया और उसमें घुलने लगे.

              सोचता हूँ कलाकार का जीवन ऐसा ही होता होगा.पर्दे पर और यथार्थ में बिल्कुल एकमेक. न प्रसिद्धि की चाहना और न ही बिगाड़ का डर. एक आशान्वित दृष्टि भर थी दप्पू खान के पास.कोई रिकॉर्ड को आता तो कामायचा बजाते बजाते तर्जनी अंगुली को सीधे छोड़ते और वो सीधी दिल मे चुभती अचानक मध्यमा से तार दबता और सुर छूट पड़ता.सादगी आंख से न जाती और चाहना पास तक न आती दूर से ही देखती रहती. कामायचा जब अपने पूरे खुमार में होता तो तार पर नजर गड़ाए दप्पू खान अचानक हल्की दृष्टि से जमी को देखते और हाथोंहाथ सामने वाले कि आंखों में देखते. यही उनका पारितोषिक था. एक मुस्कान दोनों ओर से फूटती और निर्लिप्त आकाश में लेट जाती.


                    मुस्कुराहट में संतोष था, परिस्थितियों का दुख नहीं.असल मे यही तो कलाकार होना है. जीवन रीत जाता है और कलाकार रह जाता है. दप्पू खान चले गए है और सुर-साज रह गए है.दप्पू ख़ान के लिए कामायचा कोई वाद्य नहीं था, अपितु नैवेद्य था. वे कहते थे कि उनकी पीढ़ी के छठवें आदमी से बहुत पहले देवता मुखातिब हुए थे. ईश्वर में गहन आस्था थी. रात रात भर क़ानूडो बेझिझक गाते थे. न जाने क्यों धर्म उनके सोपान की सबसे आखिरी कड़ी थी. जिसे कभी छुआ तक नहीं. जो आया खुश हुआ और लौट गया. दप्पू खान अपनी मस्ती में ही रहे. आज जब वे नहीं है तो उनकी कमी को भुला पाना असह्य है. भूलना दरअसल सबसे अछूत होता हैं. किसी के स्नेह-पाश से जकड़न छुड़ा पाना निरीह मुश्किल काम है तिस पर अगर सम्मोहन घिर आये तो मुसीबत बढ़ जाती है.

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