लुद्रवा : सांस्कृतिक विरासत

 यात्राओं के संजोग बिना सोचे अगर बनते है तो वे खूबसूरत हो जाते है. किसी रोज मैं मूमल पर लिखा दीनदयाल जी ओझा को सुना रहा था तो उन्होंने बीच मे रोकते हुए मुझे कहा कि कभी लुद्रवा गए हो? देखी है काक नदी ? मूमल के अवशेष देखे है ? मेरे पास सिवाय ना में गर्दन हिलाने के, कुछ भी नहीं था. मन मे एक इच्छा हुई कि जाना ही चाहिए. लुद्रवा मूमल-महेंद्रा के प्रेम आख्यानों से भरा प्रदेश है.शुष्क रेगिस्तान में काक नदी के अवशेष इसे जीवंतता प्रदान करते है. इसके अलावा यहां की सौंदर्यता में चार चांद लगाते है जैन मंदिर.यहां के प्राचीन घर व इमारतें तो है ही सम्मोहनीय.शांत चित्त से कहा जाए तो लुद्रवा प्रेम की धरती है. लोद्रवा का इतिहास कहता है कि यहां लोधी(परमार) राजपूतों का शासन था. किसी जमाने मे यहां के शासक थे नृपभानु और चौदह किलोमीटर दूर जैसलमेर के शासक थे देवराज. लुद्रवा के राजपुरोहित की किसी बात को लेकर नृपभानु से असमहति हो गई और वे जैसलमेर चले गए. वहां जाकर आत्मग्लानि में जलते पुरोहित ने लुद्रवा को समाप्त करने के षड़यंत्र रचे.उसने देवराज को नृपभानु की कन्या से विवाह हेतु उकसाया.नृपभानु यह सन्देश पाकर प्रसन्न हुआ कि जैसलमेर के भट्टी राजाओं से उसका संबन्ध स्थापित हो रहा है किंतु विवाह के दिन देवराज ने अपनी सेना के साथ आक्रमण कर लुद्रवा के साम्राज्य को अपने अधीन कर लिया. 




              मेरे पास जो जानकारी है वो यही है.मैं न तो इसके सही होने का दावा करता हूँ और न ही इसे निर्मूल झूठ कहूंगा.लुद्रवा का मूमल-महेंद्रा के अलावा भी कुछ अस्तित्व है ये मुझे वहां पहुंचने के बाद पता चला.लुद्रवा में प्राचीन जैन मंदिर यहां का आकर्षण है. जैन धर्मावलंबियों ने बड़े जतन से यहां लगभग दसवीं शताब्दी में मंदिरों का निर्माण करवाया है.उस समय मंदिर के मुख्य द्वार पर तोरण बनाने की परंपरा थी. बारहवीं शताब्दी में जब गौरी ने आक्रमण कर मंदिर लूटने प्रारंभ किये तो इन जैन मंदिरों में भी उसने लूट की. 1675 विक्रम संवत में थारुशाह ने सोने के बदले पत्थर खरीदकर इस मंदिर का पुनर्निमाण किया. यहां पर प्रमुख जैन मंदिर के चारों कोनों में चार जैन मंदिर स्थित है.जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ की मूर्ति सफेद पत्थर से उत्कीर्ण की गई है.मंदिर के खंभों पर बनाई गई देवी देवताओं की मूर्तियां इसे और अधिक भव्यता प्रदान करते है.जैन मंदिरों में कलात्मकता बनावटी कल्प वृक्ष भी बनाया है जिसके चारों तरफ पशु-पक्षियों और देवी देवताओं को चित्रित किया गया है जो कि जैन मंदिरों को भव्यता प्रदान करते है.




           इस काक नदी के देश का शैव- संप्रदाय से जुड़ाव भी प्रदर्शित होता है. जैन मंदिरों पर तोरण द्वार में लगे पत्थरो ने इस मान्यता को सुदृढ़ता प्रदान की है.मूमल मेड़ी से कुछ दूरी पर स्थित है शिव - मंदिर.पंचमुखी/चतुर्मुखी शिव मंदिर ने शैव संप्रदाय के प्रति जुड़ाव दर्शाया है.शिव मंदिर पहले जर्जर हालात में था लेकिन पर्यटक विभाग की पहल ने इसे एक नया रूप दे दिया है.जालम सिंह बताते है कि यहां पर सोमवार के दिन गांव के लोग आज भी अपने आराध्य शिव की पूजा करते है और महाशिवरात्रि के दिन भजन कीर्तन भी होता है.






                  यहां के संस्मरण मुझे यहां की सर्वाधिक निकटता प्रदान करते है.मुझे याद है कि कविया साहब की कविता को पढ़ते हुए मैंने अनेकों बार मूमल-महेंद्रा को स्पर्श किया है.प्रेम के साथ बहना प्रेम ही है.कहानियां बनी रहती है और प्रेम पसरता चला जाता है.इस के और अधिक सम्मोहन का कारण केसर सिंह लौद्रवा और सुमेर सिंह राठौड़ भी है. दो विपरीत वैचारिक ध्रुव वाले जनमानस प्रेम से रहते है. कूंप सा,जालम सिंह और भाणु बन्ना सुरेंद्र सा लौद्रवा की कीर्ति के मौजूदा स्तंभ है ही. लुद्रवा देश की धरती को महसूस सकना,वहां एक मुक्त सांस ले सकना और जी भर निहार सकना  सब कुछ बैठ गया है.मैं मूमल मेडी के पास खड़ा ही था मां का फोन आ गया.ये पल मेरे लिए प्रेम से भीगने जैसा था. सुरेन्द सा से जब मिला तो केसर सिंह जी के लिए स्नेहयुक्त एक याद और प्रणाम भिजवा दिया.जालमिंग का न्यौता स्वीकार न सका.समय की बाध्यता थी.सुमेर सा को भय के मारे बता ही न सका और कूंप सा जैसलमेर थे. एक याद कैद कर ली है.एक अनुभव गूंथ दिया है.



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