किसान आंदोलन - दलवीर के हवाले से

 अचानक से नीली पगड़ी का सरदार मेरे पास आकर कहता है सत श्री अकाल. मैं चोंकपड़ता हूँ.पंजाब के विषय वैविध्य वाले इलाके से एक सरदार भला यहां कैसे आ पहुंचा.मैं कुछ दिनों से किसान आंदोलन की रिपोर्ट पढ़ रहा हूँ और कोशिश रहती है कि अपडेट रह सकूं.खासकर उस दौर में जब मीडिया अपना अस्तित्व खोती जा रही है.



सामान्य बातचीत शुरू होती है.वह अपना नाम दलवीर सिंह बताता है.साथ आये शख्स का नाम बलजेन्दर सिंह बताता है.मैं दलवीर से बात करता हूँ तो वह बताता है कि वह अपने परिवार का इकलौता चिराग है.पिताजी खेत संभालते है और दलवीर ट्रक चलाते है.दो बच्चे है दलवीर के.बच्चा सातवीं में पढ़ता है और बच्ची अभी चौथी में है.पिताजी खेतों की तरफ जाते रहते है.हालांकि वे खुद काश्त नहीं करते है.बस ध्यान रखते है.



मैंने कृषि आंदोलन के बारे में जानना चाहा. मैंने उससे पूछा "आप खालिस्तानी हो ?" उसने कुछ देर मुझे देखा और फिर कहा तुम राजपूत हो ना. मैंने हामी भरी तो उसने कहा जिस तरह से तुम राजपूत हो हम सिक्ख भी है.खालिस्तानियों से हमारा भला क्या काम.मैंने उससे कहा 'खालिस्तानी भारत को तोड़ना क्यो चाहते है ?' उसने मुझसे सवाल के जरिये जवाब देते हुए कहा -: 'क्या तुम ये चाहते हो कि हम राजपूतों का एक अलग देश हो जिसमें सिर्फ राजपूत हो और भारत से अलग कुछ हो.नहीं न. भला जिस मिट्टी में जन्म लिया.खेले,पढ़ाई की,बच्चों के बड़े होने के ख्वाब संजोये उसे कोई क्यों छोड़ना चाहेगा.मेरी बेबे हमेशा कहती है मैं मर जाऊं तो तू उदास हो या या ना हो लेकिन जब तेरी जमीन चली जाए तो उदास होना पड़ेगा तुझको. जिस आदमी की जमीन चली जाए लेकिन फिर भी अगर उसको दुख न हो तो उसका जमीर नहीं होता'



मैंने उससे पूछा 'मीडिया वाले तो दिन - रात यही कहते है कि तुम खालिस्तानी हो और हिन्दुस्तान को तोड़ना चाहते हो' दलवीर ने कहा 'पंजाब एक बार बिखरने का दुख देख चुका है.आजादी के समय जो हुआ उसके बाद हम देश तोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकते.रही मीडिया की बात तो वह तो चाहता ही यही है कि किसानों का भला न हो.मोदी जी की आवाज है मीडिया जनता की नहीं.



'मोदी जी मतलब ??'

"मोदी जी हमारे देश के राजा है. हमारी उनसे लड़ाई थोड़ी है.राजा को तो जी ही कहेंगे.कानून की बात कानून के हिसाब से होगी' यह सुनकर मुझे पंजाब पर बड़ा आश्चर्य हुआ.जहां के लोग इतने दिनों से आंदोलन कर रहे है लेकिन मुखिया के प्रति वही सम्मान है अभी भी.

मैंने पूछा 'इतना बड़ा आंदोलन है लोग इतने दिन से बैठै कैसे है इनको कोई काम नहीं है क्या सारे बेरोजगार तो होंगे नहीं?'

दलवीर ने कहा हमारे यहां से एक घर से एक आदमी जाता है और कुछ दिन रहकर वापिस आ जाता है.फिर दूसरे घर वाले. इस तरह से आंदोलन भी चलता रहता है और घर के कामो में भी बाधा नहीं बढ़ती.



दलवीर ने आगे कहा - "कल रात को मैं अपने गांव के घर गिन रहा है.लगभग 170 घर है जिसमें से सौ के करीब घर ऐसे है जो सिर्फ खेती करते है.मैं जब गांव जाऊंगा तो सबसे कहूंगा कि एक गली के लोग जाएंगे और 10 दिन तक वहां रहेंगे.एक घर से से पांच सौ रुपए लिए जाएंगे ताकि रास्ते मे यदि ट्रेक्टर की या कोई ओर समस्या हो तो सुलझाया जा सके.जाने वाले अपना राशन और रहने-ओढ़ने का सारा सामान भी साथ ले जाएंगे."


जब मैंने उससे कहा कि मैं रिपोर्टर हूँ तो उसने कहा कुछ रिकॉर्ड तो नहीं किया न.मैंने कहा नहीं.हालांकि मैं रिकॉर्ड कर चुका था.झूठ के पीछे राज यह था कि सच बाहर आता रहे.फिर मैंने अपनी कवरेज दिखाई और कुछ फोटो भी खींचे.दलवीर अपने खेत से गन्ने लाया था वह साथ मे. गन्ने उतारने के लिए जब वह ट्रक पर चढ़ा तो उसने मुझे ट्रक पर लगी छोड़ी झंडी बताई.यही था न वह झंडा.मैंने कहा हां. अब हम गन्ना खाते हुए बात कर रहे थे.दलवीर ने मुझे बताया कि यह निशान साहिब का झंडा है.यह हमसे भी बड़ा है.गुरुद्वारे पे यही रहता है.


मैने उससे पूछा चाहे जो हो लेकिन 26 जनवरी पर जो हुआ वह बहुत बुरा था.मैं अब तक ऐसा मान रहा था कि वह आंदोलन के लोग नहीं थे. दलवीर ने हंसते हुए कहा "वह आंदोलन के ही लोग थे लेकिन गर्म खून था और बहक गए.जो हुआ बहुत गलत हुआ.भारत तो हम सब से बड़ा है."



दलवीर कब चले गए मुझे पता तक न चला.मुझे इस बात का दुख तो रहेगा ही कि मैं फोन नम्बर न ले सका उनके.आप यदि जानते हो तो मेरी बात करवा दीजिये उससे

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