लौटना
लौटना मुझे प्रेम से भर देता है.किसी की याद आती है और मैं नकार देता हूँ. कोई बिन बताए चला जाए तो डर लगने लगता है. मन सोचता है न जाने क्या खता थी कि कोई इतना बेदर्द हो गया.प्रेम से टकरकर मैं ऊब से भरने लगता हूँ.उदास-हताश जिंदगी हाशिए पर लौट आती है.पढ़ना-लिखना छूटने लगा है.नई खोज के नए सिरे पकड़े बैठा हूँ मैं.समाचारों से कोफ्त होने लगती है. इसमे दुनिया भर का भद्दा मजाक है बस.जो हाल यहाँ मीडिया के है उससे तो यही लगता हैं कि यह सब सूचना नहीं मनोरंजन का साधन भर है.हंसने का मन हो तो घडी भर देख लीजिए.किसी की याद परखनली में भरने लगती है तो मैं क्यूब को उल्टा कर देता हूँ.हंसी-उदासी सब बहते चले जाते है.मैं बस देखता रहता हूँ.शांत आकाश को देखता हूँ तो लगता है कुछ छूट गया है कहीं.कुछ काम कर रहा होता हूँ तो बार बार फोन देखता हूँ शायद उसके नाम का कोई नोटिफिकेशन उभर आए.मैं जानता हूँ कि यह नहीं होगा लेकिन मन को समझाया नहीं फुसलाया जा सकता है.
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काश की मैं बता सकता तुम को
प्रेम में जीने से कहीं अधिक
महत्वपूर्ण पड़ाव है
प्रेम में तिल तिल मरना
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किसी ग्रामीण तालाब के किनारे खड़े
दो खेजड़ी के सघन वृक्ष
केवल छाया नही देते
उनके पास आसरा होता है कि
दो प्रेमी निःश्शंक बैठ सके
निहार सके बालो का सुख
और झेल सके बोसों का दुःख ।
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किसी की याद की
मादक वनैली गंध
घुल जाती है भीतर
ठीक उस प्रकार जैसे
रात्रि के प्रारंभ में
टिमटिमाने लगते है असंख्य तारे।
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छंटने लगती है हताशा
ठीक उसके बाद
उग आती है अंतस में
मद्धिम सी मुस्कान
किसी से नजर मिलते ही
करने लगता हूँ स्वांग
कि जैसे कुछ भी नही हुआ
और याद सरक जाती है
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उभर आया है एक ठहराव
जीवन के सलीके में
एतबार ठीक वैसा है जैसा कि
खेतों की मेड़ पर
उछल कूद करता मेढ़क ।
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-- कमल सिंह सुल्ताना






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