सुल्ताना

 गांव के चौराहे से मुख्य गांव शुरू होता है.यहां से लोगो की बस्तियां शुरू हो जाती है.अपने-अपने काम मे लगे लोग.किनारे की दुकान निहाल सिंह की है वैसे भी ये नाम फिट बैठता है यदि ये दुकान न होती तो शायद निहाल भाई इतने निहाल न होते. बीतती उम्र के साथ शादियों के दौर आते है और चले जाते है.पास में ही मयखाना है.शराबघर किसी भी स्थान की रौनक बढ़ा सकते है.यहां आ जाने के बाद आपको सुख मिलने लगता है कारण यह है कि बाहर से आने वाले मजदूर और बावरी जाती के लोग दिन भर शराब के नशे में मुख्य सड़क के उत्तरी भाग में पड़े रहते है.ट्रैक्टर आते है और जमीं खिलती चली जाती है.चौराहे पर अलग - अलग दुकानें ऐसे बनी है जैसे एक ही खेत मे किस्म-किस्म का धान भरा रहता है.क्रमशः अंतिम दुकान है गेमर सिंह की. न जाने क्यों लोग बुट्टा ही कहते है शायद जब बच्चा था तो कान न बींधने दिया हो.शायद.मुख्य सड़क के साथ बस्तियां बढ़ती जाती है और हँसते हुए लोग चलते रहते है.यहां कोई भी आपको कह सकता है 'बीजो'. जिसका अर्थ है कि आपका स्वास्थ्य कैसा है,इन दिनों हालात कैसे है या फिर संबंधित आदमी के काम से मिलता -जुलता कुछ.दुकानें गांव को ऐसे घेरती प्रतीत होती है जैसे घर की मुख्य दीवार पर लाइट डेकोरेशन लगा रहता है.




           खूब प्रेम करने वाले लोग है यहां.प्रेम कभी प्यालों में रहता है तो अखबार पे प्याज के साथ.यहां मोटरसाइकिल पर कुछ लोग सारा दिन डोलते रहते है बस.खुश रहने वाले इन आदमियों से कोई तबियत अगर पूछे तो इन्हें मंदी खा जाती है.न जाने क्यों हर चहकने वाला आदमी यही कहेगा 'ठीक तो है पर पेलका जैड़ा कोनी'. मैं यही सोचता रहता हूँ कि पहले न जाने क्या था जो अब नही रह गया.वैसे भी मैं इन्हें केवल घूमते ही तो देख पाया हूँ अब तक.गांव में घूमने वाले लड़को के अलग-अलग रिव्यूज है.कुछ इसीलिए घूमते है कि घूम सके वहीं कुछ अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त है कि कितनी भी पढ़ाई कर ले किन्तु उत्तर जाने के सिवाय कोई रास्ता नही है. गांव के दक्षिण में जैसलमेर शहर को जाने वाले रास्ते हैं वही पूर्व में मोहनगढ़ व पश्चिमी दिशा में रामगढ़ की सड़कें है.सड़के अब भी वैसी ही है.बिल्कुल काली यहां की किस्मत की भांत.पढ़ना यहां का दोयम दर्जा है लोगों को लगता है कि पढ़ना सिर्फ समय की बर्बादी है. एक ऐसे समय से गुजरकर जब लड़के पढ़ना पाप समझते हो वहां लड़कियों के लिए शिक्षा के प्रबंध करना निरी मूर्खता है.कुछ पढ़े भी और कुछ को पढ़ाया भी.शिक्षा बढ़ती चली जाती है और प्रेम घटता चला जाता है.मुझे कभी कभी लगता है ये चीजें व्युत्क्रमानुपाती है लेकिन फिर में न्यूटन के हिस्से चला जाता हूँ.फोर्स और प्रेसर दोनों ही चलते रहते है.








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