एक याद हर याद के बाद बनी रहती है
मैं पागल होने लगता हूँ.कोई क्यों न पागल हो जब प्रेम अपने सतरंगी पंख फैलाकर दूर देश मे ले जाने को आतुर हो.ख्याल आते रहते है और उम्मीदें मरती चली जाती हैं. कुछ करने की उम्मीद कुछ भी दूसरा करने से रोके रखती है.ये सब सोचते हुए मैं अचानक आई शीत लहर से कंपन महसूस करता हूँ अगले ही क्षण मैं उठकर धूप में जाता हूँ.बैठे बैठे देखता हूँ गुलमोहर पर नए पत्ते आ गए है.जिन्हें एक गिलहरी बड़े प्रेम से कुतरने का जतन कर रही है.मैं हाथ मुंह पर चिपकाए घुटनो के बल बैठ उसे निहारने लगता हूँ.कुतरना यूं भी तो सुकून ही देता है.लोगों की आवाजें बहरा लोकतंत्र कुतर लेता है और लोग चिल्लाते हुए लगभग मर से जाते है.
अचानक आई आवाज मेरा मौन तोड़ती है.पिताजी की आवाज है.ये आवाज मेरे लिए विश्व की सबसे भयावह आवाजो में से है जिसमे क्रोध और प्रेम का अजीबोगरीब सामंजस्य है.सरपंच के चुनाव गांव में हो गए है और इन दिनों पंचायतीराज चुनाव को लेकर नित नई पंचायते होती रहती है.मैं किसी भी दल का कभी न रहा.न तो किसी पार्टी को अपने ऊपर हावी होने दिया और न ही किसी नेता को सिर चढ़ने दिया.लोग आते रहे और जमघट बना रहा.स्कूल के दिनों में भी दलों से मैं खीझता ही रहा.पढ़ाई वालो का दल,न पढ़ने वालों का दल और कुछ जिनका कोई दल नही.न उनसे इतना मिलाप रहा और न ही इनको कभी इग्नोर किया.मौसम बदलते रहे और इन बदलते मौसमों ने कई लोगो से रूबरू करवाया.कुछ साथ बने रहे और कुछ टूटते चले गए.कुछ एक जिनका हमारा नाता न था केवल साथ रहने पर मजबूरी थी,ऐसे लोग छितरते जाते है.वहीं कुछ एक जिनके लिए हम काम के अलावा भी कुछ थे. याद करते रहते है.इस तरह पुरानी याद की स्मृतियां नित नई यादों को जन्म देती चली जाती है.


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