सुगन चिड़ी



 किसी सुगनचिड़ी के गहरे नाद को सुने बरसों हो गए । एक लंबा अंतराल बिना रेत को गले लगाए ज्यों का त्यों बीत गया ।मुझसे आहट न हुई । यादें रह रहकर जेहन को कचोटती है और मन मसोसकर रह जाता हूँ । आंखे मूँदता हूँ तो आखातीज का खीच और फुलके पसर जाते है । जी करता है ,लौट चलूं ,दूर, बहुत दूर ।फिर सोचने लगता हूँ कि सपने सिर्फ सपने होते है वे हकीकत नहीं होते । नींद से भरी अलसाई आंखों से दुनिया देखने का प्रयास करता हूँ किन्तु दुनिया दिन ब दिन बढ़ती ही जाती है ।साफे के सलवटों में बचा कर रखी गई इज्जत वही है किन्तु अब साफे की रौनक न रही । ढेर से स्नेह से भरे शहरी उलाहने और अमल के खोबे मुझे दूसरी दुनिया लगते है । चैनजी कि दुकान मानो इस सृष्टि में नही हो। वो बहुत दूर तक पसरी हुई सी दिखती है ।


शाम का बखत होते ही हरजस शुरू हो जाते है । हरि के गुणगान करते हरजस । एक स्वर पनपता है, धीरे - धीरे घुल सा जाता है । मन मे आता है कि इसे हमेशा हमेशा के लिए कैद करके रख लूं । किंतु कुछ चीजें सोची जाती है,होती कभी नहीं ।सुनते सुनते ही कब लोक - परलोक हो जाता है ये बातें लिखी न जा सकती है । बल्कि वे बातें तो अनुभव की है,गहरी समझ और संवेदना की है ।




मैंने कमर में एक छोटा बर्तन बांध रखा है । कंधे पर पानी से भिगोई हुई बोतल है । कुछ एक लोगों के साथ मे आगे बढ़ता हूँ । जी चाहता है कि सारे पीलू चुग लूँ,खोखे इकट्ठे करके लेता चलूँ और पाको से दूसरी दुनिया के लोगों को चिढाना शुरू कर दूं । वे लोग मुझसे जलते ही तो होंगे जिनके हिस्से गहरी रेत न आयी,दूर तक पसरी पगडंडिया जिनसे हमेशा दूर ही रही । रावनहत्थे और अलगोजों कि लोकधुनें जिनके लिए केवल कल्पना ही रही ।कबीर के भजनों पर तंदूरे की खनक पर थिरकते लोग केवल कल्पना बनकर रह गयी । जो लोग कभी रेत का सुख भोग ही न पाए । सुदूर संभ्रात तक फैली रेत पर शामों में बैठकर जो लोग कभी खुले आसमान को निहार ही न सके ।

            


  आंख खुलते ही सपनों का संसार विलुप्त सा हो जाता है । दूर से ही एक मोर दिखता है जो बरखा के स्वागत को उत्सुक खड़ा है । नाचता हुआ सा ,गाता हुआ सा ।

नोट -: उपर्युक्त सारे चित्र सुमेर सिंह राठौड़ लोद्रवा के कैमरे से लिये गए है 




               

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